मेरी जिंदगी को ऐसा क्यों बनाया ।कभी कभी मुझे लगता है की मैं उस दिव्यांग व्यक्ति की तरह हूं जो अपने स्वयं के बल से कुछ नहीं कर पाता। अपने ओर आने वाले खतरे से वह भाग कर बच भी नही सकता।और कभी कभी लगता है की इस दुनिया में मेरा कोई नही और न ही मेरी किसी को जरूरत है क्या मैं इतना बुरा हूं।।
अपने जीवन को पुस्तकालय की किताब न बनने दो मेरे दोस्तों। तुम अपनी सामर्थ्य को पहचानों । इस पथ पर वो खड़ी है जिसका है तुमको इंतजार कहते है इसको सफलता दोस्तो।